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अंग्रेजों का भारत आगमन

अंग्रेजों का भारत आगमन


उन यूरोपीय शक्तियों में, जिन्होंने भारत और हिंद महासागरीय क्षेत्र में आकर नयी व्यापारिक गतिविधियां आरम्भ की थीं. अंग्रेज सर्वाधिक सफल एवं प्रभावकारी सिद्ध हुए। गौर करने लायक बात यह है कि पूर्वी देशों की ओर व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में अंग्रेज अपेक्षाकृत देर से आए, किंतु वे शेष यूरोपीय शक्तियों को हराते हुए सबसे आगे निकल गए। इसकी मुख्य वजह यह थी कि अंग्रेज भारत-सहित एशियाई व्यापार के स्वरूप को समझने में सफल रहे और उन्होंने इसके लिए राजनैतिक शक्ति का सहारा लिया। मुख्य कारण यह था कि इंग्लैंड की उपभोक्ता संस्कृति, औद्योगिक विकास, मांग व आपूर्ति का संतुलन तथा अनुकूल राजनैतिक स्थिति ने पूंजी निवेश की प्रवृत्ति को बहुत अधिक प्रोत्साहित किया। ( अंग्रेजों का भारत आगमन )

16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक एशियाई वस्तुएं यूरोप में पहुंचने लगी थी। 1599 ई. में एक दुस्साहसी व्यापारी मिल्डेनहॉल भारत आया था।

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई / अंग्रेज भारत कब आये

महारानी एलिजाबेथ प्रथम का चार्टरः

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1600 ईस्वी में हुई। पूर्व में अंग्रेजों या इंग्लैंड के व्यापार के संदर्भ में प्रथम महत्वपूर्ण कदम 31 दिसंबर, 1600 ईस्वी में उठाया गया जब महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने एक चार्टर (आदेश-पत्र) जारी करके गवर्नर और लंदन की कंपनी के व्यापारियों को पूरब में व्यापार के विशिष्ट अधिकार प्रदान किए। प्रारंभ में यह विशेषाधिकार 15 वर्षों के लिए प्रदान किए गए जिन्हें मई 1609 में एक नवीन चार्टर (आदेश-पत्र) के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए विस्तारित कर दिया गया। शुरुआती वर्षों में, सामान्य तौर पर व्यापारियों के एक समूह का स्वतंत्र बेड़ा भेजा जाता था, ऐसी यात्रा से प्राप्त लाभ को वे आपस में बांट लेते थे।

वित्तीय दृष्टि से East India Company डच कंपनी की तुलना में छोटी कंपनी थी। अपनी प्रथम व्यापार यात्रा में डच कंपनी की तुलना में काफी कम आमदनी हुई। इसके बावजूद अंग्रेजी कंपनी की एक विशेषता यह थी कि उसका संगठन बड़ा ही सुगठित था, इसमें 24 निदेशकों का समूह था, जिसका चुनाव प्रत्येक वर्ष शेयर होल्डर्स की आम सभा में होता था। शुरू में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना ध्यान मसाले के व्यापार विशेष रूप से इंडोनेशिया से काली मिर्च और मसाला प्राप्त होने वाले द्वीप तक केन्द्रित रखा। 12 वर्षों तक इन्हें प्रत्येक वर्ष 20 प्रतिशत लाभ होता रहा। शीघ्र ही अंग्रेजी का वस्तुओ, विशेषकर कपड़े का महत्व समझा और वे उसका उपयोग मसाला खरीदने के लिए करने लगे।

अंग्रेजों का भारत आगमन
Thomas And Jahangir

गुजरात में सूरत में कारखाना खोलने की योजना बनाई गई और कैप्टन विलियम हॉकिन्स को मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में भेजा जो 1609 में दरबार (आगरा) में पहुंचा। किंतु पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण से खाली हाथ लौटना पड़ा। जब 1611 में कैप्टन मिड्डलेटन ने सूरत के निकट स्वाली होल में पुर्तगालियों के जहाजी बेड़े को परास्त किया तो मुगल सम्राट जहांगीर ने प्रभावित होकर 1613 ईस्वी में सूरत में स्थायी कारखाना स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर दी।

इससे पूर्व 1611 ई. में मसुलीपट्टम में अंग्रेज एक कारखाना स्थापित कर चुके थे। बाद में पश्चिम तट के अनेक स्थानों पर उन्हें कारखाना खोलने की अनुमति मिली।

हॉकिन्स एवं थॉमस रो


जैसाकि विलियम हॉकिन्स 1609 ई. में जहांगीर के दरबार में पहुंचा लेकिन सूरत में कारखाना खोलने की अनुमति प्राप्त करने में असफल रहा। सन् 1615 में सर थॉमस रो को मुगल दरबार में भेजा गया जो 1619 ईस्वी तक वहां रुका। यद्यपि वह मुगल शासक जहांगीर के साथ वाणिज्यिक संधि करने में असफल रहा, तथापि मुगल भारत में विभिन्न स्थानों पर कारखाने स्थापित करने के उसने विभिन्न विशेषाधिकार सुनिश्चित किए।रो ने शाही सहायता प्राप्त करने के लिए। अपने कूटनीतिक कौशल का इस्तेमाल किया। इसके साथ-साथ उन्होंने पुर्तगालिया। जहाज को लूटना और नष्ट करना जारी रखा और भारतीय जहाजों से भारी हजा वसूल करते रहे। उन्होंने अपनी नीति के अंतर्गत चेतावनी, संधियों, षड्यत्र आक्रमण का सहारा लिया।

अंग्रेजों का भारत आगमन
William Hawkins

अंग्रेजों का व्यापारिक विस्तारः पुर्तगालियों के प्रभाव और शक्ति को समाप्त कर अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न हिस्सों में कारखानों की स्थापना की। 1623 ई. तक सूरत और मसुलीपट्टनम के अतिरिक्त भड़ोंच और अहमदाबाद में कारखाने खोले गए और कंपनी की सुरक्षा की दृष्टि से इनकी किलेबंदी की गई। 1625 में अंग्रेजों ने सूरत की किलेबंदी की। इससे उनकी क्षेत्र विस्तार की और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा का पता चलता है। डचों एवं मुगल सत्ता से टकराव से बचने के लिए अंग्रेजों ने दक्षिण भारत के छोटे-छोटे राज्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। 1622 ई. में अंग्रेजों ने ओमुंजपुर पर कब्जा कर लिया। यह एक महत्वपूर्ण विजय थी, क्योंकि इसके पश्चात् वे पुर्तगालियों के आक्रमण से सुरक्षित हो गए।

अंग्रेजों ने 1639 में स्थानीय राजा से मद्रास लीज पर ले लिया। मद्रास एक बदरगाह था और अंग्रेजों ने राजा को आधा सीमा शल्क देने का वादा किया। इसके बदल में उन्होंने किलेबंदी करने और अपना सिक्का जारी करने का अधिकार प्राप्त कर लिया। 1640 ई. में अंग्रेजों ने विजयनगर शासकों के प्रतिनिधि चंद्रगिरि के राजा से मद्रास छीन लिया। यहां पर सेंट जार्ज किले का निर्माण किया गया, जिसके भीतर कारखाने खोले गए।

1652-54 के दौरान, अंग्रेज डच से शत्रुता के कारण भारत के पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों के नजदीक आ गए। 1661 ई. में ब्रिटेन के सम्राट चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगाल की राजकुमारी से विवाह कर लिया, जिसमें दहेजस्वरूप उसे बम्बई टापू मिल गया। चार्ल्स ने इसे 10 पौण्ड वार्षिक के मामूती से किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। 1687 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय सूरत से बम्बई लाया गया और धीरे-धीरे सर चार्ज ऑक्सेनडेन (1662-1669), जेराल्ड ऑगियर (1669-77) और सर जॉन चाइल्ड (1682-90) के प्रशासन के दौरान समृद्धि की तरफ बढ़ने लगा।

पूर्वी भारत में कंपनी का बढ़ता प्रभाव


1630 के बाद पूर्वी भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव तेजी से बढ़ा। 1633 ई. में ओडिशा के बालासोर और 1651 में बंगाल के हुगली में कारखाने स्थापित किए गए। बिहार में पटना और बंगाल में ढाका और कासिम बाजार में भी कई कारखाने खुले। 1658 ई. में बंगाल, बिहार, ओडिशा और कोरोमंडल तट सेंट जॉर्ज किले के नियंत्रण में आ गए। पूर्वी भारत में, कंपनी को अपने व्यापार के लिए माल, जैसे कपड़े का थान, सिल्क, चीनी और शोरा देश के अंदरूनी हिस्सों में लाना पड़ता था। इसके लिए उन्हें कई जगह चुंगी और सीमा शुल्क देना पड़ता था। कंपनी ने बराबर इन बाधाओं को दूर करने का प्रयत्न किया। 1651, 1656 और 1672 में प्राप्त फरमानों से उन्हें इन बाधाओं से मुक्ति मिली। अब उन्हें कुछ निश्चित राशि भारतीय राजाओं को देनी पड़ती थी। 1680 में मुगल सम्राट ने कंपनी पर जजिया कर लगाया और इसके बदले में कंपनी को सूरत के अलावा सभी जगह सीमा शुल्क रहित व्यापार करने की अनुमति दे दी।

कलकत्ता में व्यापार की शुरुआत


1690 ई. में बंगाल के नवाब इब्राहिम खां ने ईस्ट इंडिया कंपनी को निमंत्रित किया। 1691 ई. के फरमान द्वारा औरंगजेब ने एक निश्चित वार्षिक राशि के बदले में बंगाल में चुंगी रहित व्यापार की अनुमति अंग्रेजी कंपनी को दी। शीघ्र ही अंग्रेजों ने सूतानती में एक कारखाना स्थापित कर लिया और इसे किलाबंद कर लिया। 1696 में एक जमींदार शोभा सिंह ने बगावत कर दी। 1698 ई. में 1200 रुपए में कंपनी ने जमींदार अर्थात राजस्व वसूलने का अधिकार खरीद लिया। इससे उन्हें सूतानती, गोविंदपुर और कलिकता गांव की जमींदारी मिल गई। इस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी ने 90 वर्षों के अंदर तीन प्रमुख बंदरगाहों-बम्बई, मद्रास एवं कलकत्ता पर अधिकार कर लिया। 17वीं शताब्दी के मध्य तक डच ईस्ट इंडिया कंपनी का सफाया हो गया।

1700 ई. में बंगाल के कारखाने प्रेसिडेंट और परिषद् के अधिकार में आ गए, जिनका मुख्यालय फोर्ट विलियम नामक किलेबंद बस्ती में था। कलिकत्ता नाम का अंग्रेजीकरण करके कलकत्ता कर दिया गया।

फर्रुखसियर फरमान एवं कंपनी व्यापार का विस्तार


औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया और अंग्रेजों ने इसका लाभ उठाते हुए कई छूटें और विशेषाधिकार प्राप्त किए। 1717 ई. में जॉन सरमैन की अध्यक्षता में अंग्रेजी शिष्ट मण्डल मुगल सम्राट फर्रुखसियर से फरमान पाने में सफल रहा जिससे 1691 के फरमान के निमित्त सुविधाएं गुजरात एवं दक्कन में बढ़ा दी गई थीं। 1717 में मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने एक शाही फरमान जारी करके कंपनी को विभिन्न विशेषाधिकार प्रदान किए। इसके अंतर्गत-

(i) ईस्ट इंडिया कंपनी को कलकत्ता के आस-पास के और अधिक क्षेत्रों में राजस्व वसूली के अधिकार प्रदान किए गए;

(ii) 10,000 रुपए सालाना राशि देने के एवज में सूरत के सभी करों से उन्हें मुक्ति मिल गई,

(iii) कंपनी को बिना शुल्क दिए बंगाल में मुक्त रूप से व्यापार करने की। छूट मिली जिसके बदले में कंपनी को 30,000 रुपए की एक रकम वार्षिक रूप से अदा करनी थी;

(iv) बंबई में ढाले गए कंपनी के सिक्के को परे मगल साम्राज्य में वैधता प्रदान करने की भी घोषणा की गई:

(v) कंपनी के हैदराबाद के पराने विशेषाधिकारा। को बनाए रखा गया और उस क्षेत्र में उन्हें कर छूट दी गई, इत्यादि विशेषाधिकार शामिल थे।

पुर्तगालियों एवं डचों के साथ अंग्रेजों का संघर्ष


स्वयं को स्थापित करने में एक ओर अंग्रेजी कंपनी को मुगल और भारतीय राज्यों से लोहा लेना पड़ा, तो दूसरी ओर उन्हें पुर्तगालियों और डचों से भी निपटना पड़ा। 17वीं शताब्दी के शुरुआती 3 दशकों में उन्हें पुर्तगालियों का सामना करना पड़ा। 1630 में मैड्रिड संधि के पश्चात अंग्रेजों और पुर्तगालियों की शत्रुता समाप्त हुई। 1634 ई. में सूरत स्थित अंग्रेजी कारखाने के अध्यक्ष और गोवा स्थित पुर्तगाली वायसराय के बीच एक दूसरी संधि हुई, जिसके अनुसार भारत के वाणिज्यिक मामलों में दोनों देशों ने एक-दूसरे की सहायता करने का निर्णय लिया। 1654 ई. में पुर्तगालियों ने पूर्व के व्यापार पर अंग्रेजों के अधिकार को स्वीकार कर लिया और 1661 की संधि के अंतर्गत भारत के डचों के विरुद्ध दोनों एकजुट हो गए।

डच व्यापारिक शक्ति के संदर्भ में गौर करें तो स्पष्ट होता है कि डचों ने मसाले के व्यापार से न केवल पुर्तगालियों को निष्कासित कर दिया था, अपितु दक्षिण-पूर्वी एशिया से अंग्रेजों को भी मार भगाया था। यद्यपि डचों की रुचि मुख्य रूप से मसाला उत्पादक द्वीपों में थी, पर उन्होंने पुलिकट (1610). सरत (1616), चिनसुरा (1653), कासिम बाजार, बरंगगोर, पटना, बालासोर, नागपटटम (1659) और कोचिन (1663) में अपने कारखाने भी खोल रखे थे।

डच अंग्रेजों की अपेक्षा सुरक्षित स्थिति में थ। उन्हान दक्षिण-पूर्व एशिया पर अपना अधिकार जमा रखा था, इसलिए उन पर का तरह भारत में राज्य क्षेत्र हासिल करने का दबाव नहीं था। 1653-54 के बाद डच और अंग्रेजों की शत्रुता मुठभेड़ की स्थिति में पहुंच गई। इसी समय डच जहाजी बेड़े स्वाली के निकट पहुंच गए और अंग्रेजों को सूरत में अपना कारोबार गित करना पड़ा। 1667 में डच भारत में स्थापित अंग्रेजी अड्डों को छोड़ने के लिए राजी हो गए और अंग्रेजों ने इंडोनेशिया पर अपना दबाव छोड़ दिया। इस प्रकार दोनों शक्तियों ने पारस्परिक समझौता कर लिया। इसके बावजूद अंग्रेज निरंतर डचों को भारत भूमि से बाहर निकालने का प्रयत्न करते रहे; और डचों ने देशी व्यापार तक स्वयं को सीमित कर लिया। अठारहवीं शताब्दी में डचों का तेजी से पतन हुआ। अंग्रेजों के विशेषाधिकारों में वृद्धि हुई और उन्होंने कई वस्तुओं के व्यापार पर नियंत्रण कर लिया।

अंत में 1795 में अंग्रेजों ने डचों को भारत से निकाल बाहर किया जिससे उनका भारत अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गये। – अंग्रेजों के व्यापार एवं विस्तार का प्रभाव अंग्रेजों ने शीघ्र ही अरब सागर और फारस की खाड़ी पर अपना एकाधिकार कर लिया। अंग्रेज भारत से वस्त्र, नील, शोरा, मसाले, मलमल इत्यादि ले जाते थे। आरम्भ में, अंग्रेजों द्वारा भारतीय वस्तुओं का बड़े पैमाने पर आयात किए जाने के कारण भारतीय दस्तकारी को बहुत लाभ पहुंचा। बड़े-बड़े भारतीय व्यापारी कम्पनी के मध्यस्थ व्यापारी के रूप में काम करने लगे। अपनी समकालीन यूरोपीय तथा भारतीय शक्तियों को पराजित करने के बाद, अंग्रेजों ने भारत में अपना राजनीतिक प्रसार आरम्भ कर दिया, ताकि व्यापारिक आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। इसी क्रम में अंग्रेज, भारत में मुगलों की वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभरे।

1764 ई. तक बंगाल-विजय के बाद से तो अंग्रेजों ने ब्रिटिश औद्योगिक क्राति की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यापार को स्वरूप प्रदान किया।

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