Rashtriya Aay राष्ट्रीय आय की अवधारणा - GDP, NDP, GNP

Rashtriya Aay राष्ट्रीय आय की अवधारणा – GDP, NDP, GNP

राष्ट्रीय आय की अवधारणा  (The idea of National Income)

वैसे तो इसका पता सामान्य तौर पर देश और वहां के लोगों की खुशहाली और उनकी प्रसन्नता से लगाते हैं। हालांकि आय से किसी भी समाज के बेहतर और कुशल होने का अनुमान नहीं । लगाया जा सकता है। इस राय के पीछे कई वजहें भी हैं। जब 1990 के शुरुआती सालों में मानव विकास सूचकांक की शुरुआत हुई तो इसमें किसी देश में प्रति व्यक्ति आय को काफी प्राथमिकता दी गई थी। लेकिन समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति तभी बेहतर होती है जब इन क्षेत्रों में भारी पैमाने पर निवेश किया जाता हो। यही वजह है कि विकास या मानव विकास का केंद्र बिंदु आय को माना जाता है।

जैसे एक आदमी की आय को आकलित किया जा सकता है, उसी तरह से पूरे देश की आय का आकलन संभव है और पूरे विश्व की आय का अनुमान लगाना संभव है हालांकि पूरे विश्व की आय को मापने का तरीका मुश्किल जरूर है। बहरहाल किसी . भी देश की आय को आकलित करने के लिए अर्थशास्त्र में चार दृष्टिकोण हैं।

ये चारों दृष्टिकोण हैं- GDP, NDP, GNP और NNPI ये सब किसी भी देश की राष्ट्रीय आय के रूप हैं, लेकिन सब एक-दूसरे से भिन्न हैं। इन चारों दृष्टिकोणों पर नीचे एक परिचर्चा प्रस्तुत की गयी है।

जीडीपी (GDP) सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product-GDP)

GDP

किसी भी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का अंतिम (Final) मौद्रिक मूल्य है। भारत के लिए यह एक वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक है। इसका आकलन राष्ट्रीय निजी उपभोग, सकल निवेश, सरकारी एवं व्यापार शेष (निर्यात-आयात) के योगफल द्वारा भी किया जाता है। इस विधि में देश के बाहर उत्पादित आयातों के व्यय को तथा उन देश-निर्मित वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य जुड़ा होता है जिन्हें देश में नहीं बेचा गया है।

इस दृष्टिकोण में इस्तेमाल किए गए पदों को समझना आवश्यक है। अर्थव्यवस्था और वाणिज्य में ‘ग्रॉस’ (gross) का मतलब वही होता है जो गणित में ‘कुल’ (total) का मतलब होता है। ‘डोमेस्टिक’ का मतलब देश और उसकी पूँजी से होने वाली आर्थिक गतिविधि है। ‘प्रॉडक्ट’ का मतलब वस्तु और सेवा है, जबकि ‘फाइनल’ का मतलब है कि किसी भी उत्पाद में अब वैल्यू एडिशन का मौका नहीं है। जीडीपी के विभिन्न उपयोग निम्न हैं: (i) GDP में होने वाला वार्षिक प्रतिशत परिवर्तन ही किसी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर (Growth Rate) है।

उदाहरण के लिए किसी देश की GDP 107 रुपया हैऔर यह बीते साल से 7 रुपया ज्यादा है तो उस देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7 प्रतिशत है। जब हम किसी देश की अर्थव्यवस्था को ‘ग्रोइंग’ (growing) इकॉनमी कहते हैं तो मतलब यह होता है कि देश की आय परिमाणात्मक रूप से बढ़ रही है।

(ii) यह परिमाणात्मक (quantitative) दृष्टिकोण है। इसके आकार से देश की आंतरिक शक्ति का पता चलता है। लेकिन इससे देश के अंदर उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता के स्तर का पता नहीं चल पाता है।

(iii) तुलनात्मक अर्थशास्त्र में इस आंकड़े का सर्वाधिक उपयोग होता है। आ

IMF द्वारा विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के जी.डी.पी. को क्रय शक्ति तुल्यता (purchasing power parity) के आधार पर श्रेणीबद्ध (ranking) भी किया जाता है। वर्तमान में भारत का जी.डी.पी. विश्व में तीसरे स्थान (PPP के आधार पर) पर है (चीन एवं सं.रा. अमेरिका के बाद)। वैसे प्रचलित विनिमय दर के आधार पर (यू. एस. डॉलर में) भारत विश्व का 5 सबसे बड़ा देश है।

NET DOMESTIC PRODUCT || शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP)

किसी भी अर्थव्यवस्था का वह जीडीपी है, जिसमें से एक वर्ष के दौरान होने वाली घिसावट (Depreciation) को घटाकर प्राप्त किया जाता है। वास्तव में जिन संसाधनों द्वारा उत्पादन किया जाता है, उपयोग के दौरान उनके मूल्य में कमी हो जाती है, जिसका मतलब उस सामान के घिसने (Depreciation) या टूटने-फूटने से होता है। घिसावट की दर सरकार निर्धारित करती है तथा भारत में यह फैसला केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय करता है। यह एक सूची जारी करता है जिसके मुताबिक विभिन्न उत्पादों में होने वाली घिसावट की दर तय होती है। उदाहरण के लिए, भारत में रिहाइशी निवास की सालाना घिसावट एक प्रतिशत है, वहीं बिजली से चलने वाले पंखे के मूल्य में 10 प्रतिशत की कमी होती है। विदेशी विनिमय बाजार में अगर घरेलू मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा के सामने कम होता है तो उसे घरेलू मुद्रा की घिसावट (depreciation) कहते हैं।

– इस तरह से देखें तो NDP= GDP – घिसावट।

ऐसे में जाहिर है कि किसी भी वर्ष में किसी भी अर्थव्यवस्था में एनडीपी हमेशा उस साल की जीडीपी से कम होगा। घिसावट को शून्य करने का कोई भी तरीका नहीं है। लेकिन मानव समाज इसे कम-से-कम करने के लिए कई तरकीबें निकाल चुका है। NDP के अलग-अलग प्रयोग हैं:

(i) इसका उपयोग घिसावट के चलते होने वाले नुकसान को समझने के लिए किया जाता है। इतना ही नहीं खास समयावधि के दौरान उद्योग-धंधे और कारोबार में अलग-अलग क्षेत्र की स्थिति का अंदाजा भी इससे लगाया जा सकता है।

(ii) घिसावट की मात्रा कम करने से जुड़े अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में अर्थव्यवस्था की उपलब्धि को दर्शाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।

लेकिन एनडीपी का इस्तेमाल दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना के लिए नहीं किया जाता है। ऐसा क्यों है? इसकी वजह है दुनिया की अलग-अलग अर्थव्यवस्थाएं अपने यहां घिसावट की अलग-अलग दरें निर्धारित करती हैं। यह दर मूल रूप से तार्किक आधार पर तय होता है। उदाहरण के लिए भारत में मकान में होने वाले घिसावट की दर को लें, मकान बनाने में सीमेंट, ईंट, बालू और लोहे की छड़ इत्यादि का इस्तेमाल होता है और यह माना जाता है कि ये आने वाले 100 साल तक चलेंगी। लिहाजा यहां घिसावट की दर 1 प्रतिशत सालाना होती है। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार इसका फैसला तार्किकता के आधार पर ही हो। उदाहरण के लिए, फरवरी 2002 में भारी वाहन (ऐसे वाहन जिनमें 6 या उससे ज्यादा चक्के या पहिए हों) में घिसावट की दर 20 प्रतिशत थी जिसे 40 प्रतिशत कर दिया गया। ऐसा देश में भारी वाहन की बिक्री को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया। दर को दोगुना करने के लिए कोई तर्क सही नहीं हो सकता। मूलतः घिसावट और उसकी दरें भी आधुनिक सरकारों के लिए आर्थिक नीतियों को बनाने के लिए एक हथियार है। अर्थव्यवस्था में घिसावट का तीसरी तरह से इस्तेमाल इस रूप में होता है।

GROSS NATIONAL PRODUCT || जीएनपी (GNP)

किसी अर्थव्यवस्था का सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) उसके जीडीपी में विदेशों से होने वाली आय को जोड़कर हासिल होता है। इसमें देश की सीमा से बाहर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को भी शामिल किया जाता है। विदेशों से होने वाली आय में निम्नांकित पहलू शामिल हैं:

(i) निजी प्रेषण (Private Remittances):

भारत के नागरिक दुनिया के दूसरे देशों में काम करते हैं और दुनिया के दूसरे देशों के नागरिक भारत में भी काम करते हैं। इन लोगों के निजी लेन-देन से जो आमदनी होती है उसे निजी प्रेषण से होने वाली आमदनी कहते हैं। भारत इस मामले में हमेशा फायदे में रहा क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय लोग खाडी. अमेरिका और अन्य युरोपीय देशों में काम करने के लिए जाते हैं। आज भारत दुनिया में निजी प्रेषण के जरिए सर्वाधिक आमदनी करने वाला देश है। विश्व बैंक (अप्रैल 2019) के अनुसार वर्ष 2018 में भारत पुनः विश्व का सर्वाधिक निजी प्रेषण प्राप्त करने वाला देश रहा (कुल 80 अरब अमेरिकी डॉलर)। इस मामले में चीन (67 अरब डॉलर) विश्व का दूसरा तथा मेक्सिकों एवं फिलिपीन्स (प्रत्येक 34 अरब डॉलर) तीसरा देश है।

(ii) विदेशी ऋणों का ब्याज (Interestofthe External Loans):

यह विदेशी ऋणों के ब्याज की राशि के अंतः प्रवाह एवं बहिप्रवाह का परिणाम है। भारत की इससे होने वाली आय ऋणात्मक है क्योंकि इसके द्वारा लिया गया विदेशी कर्ज इसके द्वारा दिए गए ऐसे कर्ज से अधिक है।

(iii) विदेशी अनुदान (External Grants):

इसके अंतर्गत भारत द्वारा प्राप्त किए गए एवं दूसरे देशों को दिए गए अनुदान का शेष (Balance) शामिल किया जाता है। काफी निम्न ही सही लेकिन भारत को अन्यान्य विदेशी क्षेत्रों से अनुदान की प्राप्ति होती है (यथा-UNDP एवं राष्ट्रों से), जो मूलतः मानवीय आधारों पर दिए जाते हैं। वैश्वीकरण के प्रारंभ के बाद भारत का अनुदान व्यय भारत के राजनयिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है जो भारत के अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उच्च भूमिका अदा करने के प्रयासों से जुड़ा है। बहरहाल, इन तीनों अलग-अलग मदों से होने वाली आमदनी घनात्मक या ऋणात्मक हो सकती है। भारत के मामले में यह हमेशा नुकसान वाली स्थिति में होती है क्योंकि भारत पर काफी ज्यादा विदेशी कर्ज है और अनुदान की प्राप्ति घटती गयी है। इसका मतलब यह है कि भारत के GNP को आकलित करने के लिए GDP में विदेशों से होने वाली आमदनी जुड़ने के बजाए घटेगी। _ सामान्य फॉर्मूले के मुताबिक GNP, GDP+ विदेशों से होने वाली आय के बराबर है। लेकिन भारत को विदेशों से ऋणात्मक आय होती है लिहाजा भारत का GNP हमेशा GDP से कमतर होता है।

GNP के विभिन्न उपयोग इस तरह से हैं:

(i) इसके आधार पर आईएमएफ देशों को उनकी क्रय शक्ति तुल्यता (PPP) के आधार पर रैंक करता है। PPP के बारे में विस्तार से शब्दकोष (Glossary) में पढ़ सकते हैं। इस आधार पर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन और यू.एस.ए. के बाद भारत का स्थान है। लेकिन भारतीय मुद्रा के विनिमय दर के आधार पर भारत दुनिया की 6ठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (आई.एम.एफ., अप्रैल 2019)। अब यह तुलना GDP के आधार पर भी की जाती है। को इसके आधार पर आईएमएफ देशों को उनकी क्रय शक्ति तल्यता (PPP) के आधार पर रैंक करता है। PPP के बारे में विस्तार से शब्दकोष (Glossary) में पढ़ सकते हैं। इस आधार पर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। चीन और यू.एस.ए. के बाद भारत का स्थान है। लेकिन भारतीय मुद्रा के विनिमय दर के आधार पर भारत दुनिया की 6ठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (आई.एम.एफ., अप्रैल 2019)। अब यह तुलना GDP के आधार पर भी की जाती है।

(ii) राष्ट्रीय आय को आंकने के लिहाज से GNP, GDP की तुलना में विस्तृत पैमाना है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की परिमाणात्मक के साथ-साथ गुणात्मक तस्वीर भी पेश करता है। यह किसी भी अर्थव्यवस्था की आंतरिक के साथ-साथ बाहरी ताकत को भी बताता है।

(iii) यह किसी भी अर्थव्यवस्था के पैटर्न और उसके उत्पादन के व्यवहार को समझने में काफी मदद करता है। यह बताता है कि बाहरी दुनिया किसी देश के खास उत्पाद पर कितना निर्भर है और वह दुनिया के देशों पर कितना निर्भर है। यह अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में किसी भी अर्थव्यवस्था को अपने मानव संसाधनों के बारे में, उनकी संख्या और और उनसे होने वाली आमदनी के बारे में बताता है। इसके अलावा यह किसी भी अर्थव्यवस्था के दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ रिश्ते पर भी रोशनी डालता है (यह दुनिया के देशों से लिए गए ऋणों या फिर दूसरे देशों को दिए गए ऋणों से पता चलता है)।

NET NATIONAL PRODUCT || एनएनपी (NNP)

ग्रॉस नेशनल प्रॉडक्ट (GNP) में से घिसावट को घटाने के बाद जो आय बचती है, उसे ही किसी अर्थव्यवस्था का शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) कहते हैं। यानी NNP को हम इस तरह से हासिल कर सकते हैं:

NNP = GNP – घिसावट या फिर, SNNP = GDP + विदेशों से होने वाली आय – घिसावट

NNP के विभिन्न उपयोग इस तरह से हैं:

(i) यह किसी भी अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय आय (National Income-NI) है। यद्यपि GDP, NDP और GNP म सभी राष्ट्रीय आय ही हैं लेकिन राष्ट्रीय आय (NI) के तौर पर नहीं लिखा जाता।

(ii) यह किसी भी देश की राष्ट्रीय आय को आकलित करने

का सबसे बेहतरीन तरीका है।

(iii) जब हम NNP को देश की कुल आबादी से भाग देते हैं तो देश की प्रति व्यक्ति आय (PCI) का पता चलता 20 है। यह प्रति व्यक्ति सालाना आय होती है। यहां एक मूल बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि अलग-अलग देशों में घिसावट की दरें अलग-अलग होती हैं जिसका उनकी राष्ट्रीय आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

वैसे राष्ट्रीय आय आकलित करने के लिए केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने जनवरी 2015 में बेस ईयर और मेथडॉलॉजी को संशोधित किया है। इसका वर्णन आगे दिया गया है।

राष्ट्रीय आय की लागत और मूल्य तक (Cost and Price of National Income) कु न राष्ट्रीय आय की गणना करते समय ‘लागत’ और ‘मूल्य’ का ध्यान रखा जाता है। दरअसल लागत और मूल्य की दो श्रेणियां हैं; और अर्थव्यवस्था को यह तय करना होता है कि कौन-सी लागत और मूल्य के आधार पर राष्ट्रीय आय का आंकलन किया जाएगा। हमें इस भ्रम और इस भ्रम की उपयुक्तता को समझ लेना चाहिए।

(A) लागतः किसी अर्थव्यवस्था की आय, मतलब, इसकी कुल उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की गणना या तो कारक लागत (factor cost) पर की जा सकती है या फिर बाजार लागत (market cost) पर। इन दोनों में अंतर क्या होता है? ‘कारक लागत’ मूलत: ‘निवेश की गई लागत’ होती है जिसे उत्पादक उत्पादन प्रक्रिया के दौरान लगाता है (जैसे कि पूंजी की लागत, ऋणों पर ब्याज, कच्चा माल, श्रम, किराया, बिजली इत्यादि)। इसे ‘फैक्ट्री लागत’ या ‘उत्पादन लागत/मूल्य’ भी कहते हैं। यह कुछ और नहीं निर्माता के नजरिए से वस्तु की कीमत’ है। दूसरी तरफ ‘बाजार लागत’ वस्तु की ‘कारक लागत’ पर अप्रत्यक्ष कर जोड़ने के बाद प्राप्त होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह लागत जिस पर वस्तु बाजार में पहुंचती है, मतलब शोरूमों में (उत्पादक, जी.एस.टी., केंद्र सरकार को सेनवेट/केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीएसटी देते हैं)। भारत आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय आय की गणना कारक लागत (Factor cost) पर किया करता था। वैसे राष्ट्रीय आय के आंकड़े बाजार लागत (market cost) पर भी प्रकाशित किए जाते थे जिसका इस्तेमाल सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र किया करता था। जनवरी 2015 से CSO द्वारा राष्ट्रीय आय की गणना बाजार मूल्य (market price) पर की जा रही है जो वास्तव में बाजार लागत (market cost) पर ही है। सकल मूल्य वर्द्धन (GVA) में उत्पाद करों (Product taxes) को शामिल करने के बाद ‘बाजार मूल्य’ ज्ञात होता है। उत्पाद कर केन्द्र एवं राज्यों के अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) हैं। वस्तु एवं सेवा कर (GST) को अपना लेने के बाद इस गणना में काफी सुविधा होगी।

(B) मूल्य: आय को दो-मूल्यों स्थायी (constant) और चालू (current) से निकाला जा सकता है। स्थायी और चालू मूल्यों में अंतर सिर्फ मुद्रास्फीति के असर का है। स्थायी मूल्य के मामले में मुद्रास्फीति को पहले के किसी साल में स्थिर माना जाता है (जिसे ‘आधार वर्ष’ कहा जाता है) जबकि वर्तमान मूल्य के लिए इसमें मुद्रास्फीति को जोड़ा जाता है। दरअसल, वर्तमान मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) है जिसे हम बाजार में बिकने वाली चीजों पर अंकित देखते हैं।

नई गाइडलाइंस के मुताबिक भारत का आधार वर्ष (Base Year)2004-05 से संशोधित होकर 2011-12 हो गया है।

भारत अपनी राष्ट्रीय आय का आकलन स्थिर मूल्य पर करता है, यही हाल दूसरे विकासशील देशों का है। वहीं विकसित देश अपनी राष्ट्रीय आय का आकलन वर्तमान मूल्य के आधार पर करते हैं। हालांकि सांख्यिकी गणना के लिए सीएसओ वर्तमान मूल्य के आधार पर भी राष्ट्रीय आय के आंकड़े जारी करता है। आखिर क्यों? दरअसल, भारत के नीति निर्माण में महंगाई एक चुनौतीपूर्ण पहलू है। महंगाई की दर बढ़ती रही है और यह स्थायित्व के करीब नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की आमदनी में वृद्धि के स्तर का आकलन संभव नहीं होगा और सरकार को कभी भी अपने गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के वास्तविक असर का पता नहीं चलेगा।

किसी व्यक्ति या फर्म (firm) की आय तीन तरह से सूचित की जा सकती है-नामिक आय, वास्तविक आय एवं प्रयोज्य आय। मजदूरी एवं वर्तमान से प्राप्त होने वाली राशि नामिक (nominal) आय है और अगर इसमें से तात्कालिक मुद्रास्फीति दर को बाद कर दिया जाए तो वह वास्तविक (real) आय होगी। इसी तरह नामिक आय में से जब प्रत्यक्ष करों के भुगतान को बाद कर दिया जाए तो हमें प्रयोज्य (disposable) आय का पता लगता है। – उदाहरण के तौर पर अगर किसी की मजदूरी की आय प्रतिदिन – 100 रु. है (नामिक आय) और इस समय यदि मुद्रास्फीति की दर में 10 प्रतिशत है तो उस मजदूर की वास्तविक आय मात्र 90 रु. ही न होगी। विकसित देशों में चूंकि मुद्रास्फीति की दर पिछले लगभग 5 ने दशकों में (कुल अपवादों को छोड़कर) 2 प्रतिशत के आस-पास द रही है। उनके स्थायी एवं चालू मूल्यों की राष्ट्रीय आयों में काफी ) कम अंतर है और इनमें स्थायित्व भी है। यही कारण है कि इन देशों द्वारा राष्ट्रीय आय का आकलन चालू मूल्यों पर किया जाता है और उन्हें आय का बेहतर अंदाजा मिलता है।

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राष्ट्रीय आय लेखा के आधार वर्ष एवं विधि में संशोधन (Revision in The Base Year and Method of National Income Accounting)

केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने जनवरी 2015 में राष्ट्रीय लेखा के नए एवं संशोधित आंकड़े जारी किए गए हैं, जिनमें दो परिवर्तन किए गए हैं:

इसके अन्तर्गत आधार वर्ष 2004-05 को संशोधित करके 2011-12 कर दिया गया है। यह राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) की अनुसंशा के आधार पर किया गया है, जिसमें प्रत्येक 5 वर्ष पर सभी आर्थिक घटकों के आधार वर्ष को संशोधन करने की सलाह दी गई थी।

राष्ट्रीय लेखा के गणना की कार्यप्रणाली में संशोधन कर अंतर्राष्ट्रीय मापदंड के अनुरूप राष्ट्रीय लेखा-2008 के उपाय की पूर्ति की गई। चालू आधार वर्ष का संशोधन जनवरी 2010 में किए गए संशोधन के बाद का है। आधार वर्ष में हुए संशोधन में शामिल किए गए प्रमुख फेरबदल निम्नलिखित हैं:

(i) वर्तमान में विकास को स्थिर बाजार मूल्यों पर स.घ.उ. द्वारा मापा जाएगा, जिसे इसके बाद “GDP” के रूप में संदर्भित किया जाएगा, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलन है। इससे पूर्व, विकास को स्थिर मूल्यों पर कारक लागत पर GDP में वृद्धि दर की दृष्टि से मापा जाता था।

(ii) जोड़े गए सकल मूल्य का क्षेत्रवार अनुमान अब कारक लागत के स्थान पर मूल कीमतों पर किया जाएगा। कारक लागत पर GVA,7 मूल कीमतों पर GVA और GDP (बाजार कीमतों पर) के बीच संबंध नीचे दिया गया है:

मूल कीमतों पर जी.वी.ए. = सी.ई. + ओ.एस./एम.आई. + सी.एफ.सी. + उत्पाद कर – उत्पाद छूट

कारक लागत पर जी.वी.ए. = मूल कीमतों पर जी.वी.ए. – उत्पादन कर + उत्पादन छूट

GDP = 2 मूल कीमतों पर जीवीए + उत्पाद कर – उत्पाद सब्सिडी

(जहां सीई: कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति; ओएस: परिचालन अधिशेष; एमआई: मिश्रित आय; और सीएफसी: अचल पूंजी का उपभोग है। उत्पादन करों या उत्पादन सब्सिडियों का भुगतान या इनकी प्राप्ति उत्पादन से संबंधित होती है और ये वास्तविक उत्पादन के परिमाण पर आश्रित नहीं होते। उत्पादन करों के कुछ उदाहरण भू-राजस्व, स्टाम्प और पंजीयन शुल्क तथा व्यावसायिक कर हैं। कुछ उत्पादन सब्सिडी रेलवे को सब्सिडी, किसानों को वस्तुगत सब्सिडी, गांवों और लघु उद्योगों को सब्सिडी, निगमों या सहकारी समितियों को प्रशासनिक सब्सिडी आदि हैं। उत्पादन करों या सब्सिडी का भुगतान या इनकी प्राप्ति उत्पाद के प्रति यनिट पर होती है। उत्पाद करों के कुछ उदाहरण उत्पाद कर, बिक्री कर, सेवा कर और आयात-निर्यात शुल्क है। उत्पाद सब्सिडी में खाद्यान्न, पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी, किसानों के परिवारों आदि को बैंकों के जरिए प्रदत्त ब्याज इमदाद, परिवारों का बीमा कराने के लिए कम दरों पर प्रदत्त सब्सिडी शामिल हैं।

(iii) कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की ई-अभिशासन पहल, MCA21 के अंतर्गत उसमें यथा दर्ज कंपनियों के वार्षिक लेखाओं के समावेशन से विनिर्माण और सेवा दोनों ही कारपोरेट क्षेत्र की व्यापक कवरेज। विनिर्माण कंपनियों के एमसीए 21 डाटाबेस के उपभोग से इन कंपनियों द्वारा विनिर्माण से भिन्न किए गए कार्यों का हिसाब-किताब रखने में मदद मिली है।

(iv) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), स्टाक ब्रोकर, स्टाक एक्सचेंजों, आस्ति प्रबंधन कंपनियों, म्युचुअल फंडों और पेंशन फंडों और पेंशन निधि एवं विनियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) और बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) सहित विनियामक निकायों के लेखाओं से सूचना के समावेशन से वित्तीय क्षेत्र को व्यापक सुरक्षा कवरेज।

(v) स्थानीय निकायों और स्वायत संस्थाओं के कार्यकलापों, जिनमें इन संस्थाओं को प्रदत्त लगभग 60 प्रतिशत अनुदान/अंतरण राशियां शामिल हैं, की संवर्द्धित कवरेज।

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