न्यायालय की अवमानना (Contempt of court) में महान्यायवादी की भूमिका - Nyayalay ki Avmanna me Mahanyaywadi ki bhoomika

न्यायालय की अवमानना (Contempt of court) में महान्यायवादी की भूमिका – Nyayalay ki Avmanna me Mahanyaywadi ki bhoomika

Current affairs about contempt of court (upsc in hindi)

  • हालिया मामले में भारत के न्यायवादी ने आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर के खिलाफ न्यायालय की अवमानना [Contempt of court] का केस चलाने को लेकर सहमति देने से इंकार कर दिया है । यह मामला उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणी का था ।
  • सबसे पहले चंद्रशेखर के विरुद्ध contempt of court act 1971 के तहत मामला चलाने की मांग की गई थी ।

अदालत की अवमानना (Contempt of court)क्या है ?

किसी भी प्रकार से अदालत के न्याय अथवा अधिकार के विरोध में या किसी इसके अधिकारियों के अधिकार की अवहेलना करना साधारण तः अदालत की अवमानना माना जाता है ।

supreme court hammer

अदालत की अवमानना संबंधी कानून (Laws About Contempt of court)

अदालत की अवमानना अधिनियम 1971 – Contempt of court Act 1971

इस अधिनियम के अंदर सिविल अथवा आपराधिक अवमानना को परिभाषित किया गया है एवं अवमानना के लिए दोषियों को अदालत को शक्तियां निर्धारित की गई है।

आर्टिकल 129

उच्चतम न्यायालय एक कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड होगा और इसके अंतर्गत अदालत की अवमानना के लिए दंड देने की समस्त शक्तियां होंगी।

आर्टिकल 215

इसमें हाईकोर्ट की अदालत की अवमानना के लिए दंड देने की शक्तियां बताई है

आर्टिकल 141

सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित विधि  भारत के क्षेत्र में बाध्यकारी होगी।

अवमानना की कार्यवाही शुरू करने में महान्यायवादी के सहमति की आवश्यकता है?

  • किसी भी को संज्ञान में लेने से पहले अटार्नी जनरल की सहमति की आवश्यकता का कारण अदालत का समय बचाना है अदालत में बहुत सी याचिकाएं आती है तो पहले स्तर पर ही इनकी छटनी आवश्यक है , इन सब से अदालत अपना समय बचा पाती है ।
  • किसी नागरिक के खिलाफ अदालत की अवमानना के लिए कार्यवाही शुरू करने के लिए महान्यायवादी की सहमति की आवश्यकता होती है।
  • जब अदालत स्वयं ही संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करती है तो अटॉर्नी जनरल की सहमति की आवश्यकता जरूरी नहीं होती है। क्योंकि संविधान में यह शक्तियां अदालत के अंदर ही निहित है।
  • जब महान्यायवादी सहमति नहीं देता है तो मामला खत्म हो जाता है परंतु शिकायतकर्ता के इस मामले को अदालत स्वयं ही संज्ञान में ले सकता है।

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